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   Le 01/05/26 à 15h46 Citer      

Booster Fuzil

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मेरी ज़िंदगी में जुआ कभी विकल्प नहीं था। विलासिता नहीं, बल्कि मजबूरी ने मुझे उस रात उस बटन पर क्लिक करने पर मजबूर कर दिया।

कहानी कुछ ऐसी है। मैं एक छोटे से कस्बे में रहता हूँ, जहाँ हर कोई सबको जानता है। मेरी नौकरी थी—एक प्राइवेट कंपनी में अकाउंटेंट। तनख्वाह महीने की दस तारीख को आती थी, और उनतीस तारीख तक वह पिघल जाती थी। पत्नी को कभी शिकायत नहीं थी, पर उसकी चुप्पी मुझे ज्यादा डराती थी।

फिर एक दिन सब पलट गया।

कंपनी बंद हो गई। हाँ, एक ईमेल में। बस "ओवरहालिंग" शब्द के साथ। मैं रात को करीब दस बजे घर पहुँचा, चाय बनाई और छत पर जाकर बैठ गया। सामने पूरा शहर चमक रहा था, पर मेरी जेब में महज चार सौ रुपए थे। कल सब्जी लानी थी, दूध खत्म होने वाला था, और बेटी के स्कूल की फीस पिछले दो महीने से बकाया पड़ी थी।

मैं अक्सर सोशल मीडिया पर समय काटता था। उस रात किसी ने एक लिंक शेयर किया था। मैंने बिना सोचे https://vavada.solutions/hi/ खोल लिया। वैसे भी देखने के लिए क्या था? न तो टीवी चल रहा था, न ही नींद आ रही थी।

शुरुआत में मैंने इसे महज एंटरटेनमेंट समझा। वहाँ के गेम्स रंग-बिरंगे थे, जैसे बचपन वाले आर्केड हों। पहले मैंने सिर्फ देखा। दस मिनट देखा। फिर सोचा—क्या होगा अगर सौ रुपए डाल दूं? अब तुम सोचोगे, बेरोजगार होकर जुआ? हाँ, बिल्कुल वैसा ही है जैसा पानी में डूबते हुए कोई तिनके को पकड़ना। तर्क नहीं था। सिर्फ एक उम्मीद थी।

मैंने दो सौ रुपए डाले। पहला गेम हार गया। दूसरा भी हार गया। तीसरे में मैं गुस्से में था। "बस यही आखिरी बार," मैंने खुद से कहा। और फिर "स्पिन" दबाया।

स्क्रीन जम गई। मुझे लगा गेम क्रैश हो गया है। पर नहीं—वो लोडिंग थी। अगले ही पल नंबर उछलने लगे। सबसे पहले मुझे समझ नहीं आया। फिर सामने एक अंक आया: अट्ठारह हजार रुपए।

मेरे हाथ काँपने लगे। मैं चिल्लाया नहीं, क्योंकि परिवार सो रहा था। बस गहरी साँस ली। मैंने तुरंत पैसे निकाल लिए। पूरे। बिना एक रुपया और खेले। रात के दो बज रहे थे, और मैं खुशी से छत पर नंगे पाँव घूम रहा था।

अगले दिन मैंने फीस जमा करवाई। बेटी को नया स्कूल बैग लाकर दिया। पत्नी ने पूछा, "कहाँ से आए पैसे?" मैंने हँसकर टाल दिया। पर रात को उसने मोबाइल देखा—ब्राउज़र हिस्ट्री में https://vavada.solutions/hi/ खुला था। वह रो पड़ी। “तू जुआ खेल रहा था?” मैंने उसे पूरी बात बताई। उस दिन वह पहली बार हँसी, “तेरी बेवकूफी पर भगवान को तरस आ गया।”

वो दिन मेरी ज़िंदगी का टर्निंग पॉइंट बन गया। मैं समझ गया कि किस्मत कभी बटन दबाने से नहीं बदलती। पर उस रात उसने मुझे सिर्फ पैसे नहीं दिए—उसने मुझे वक्त दिया। तीन हफ्ते का वक्त, जब तक मैंने नई नौकरी ढूंढी। अब जब भी मैं कभी कभार बोरियत में https://vavada.solutions/hi/ पर जाता हूँ, तो उस रात को याद करता हूँ। वह सन्नाटा, वह चमकता हुआ मोबाइल, और वह अठारह हजार—जो बड़ी रकम नहीं थी, लेकिन उस वक्त मेरे लिए दुनिया थी।

जीत हमेशा बैंक बैलेंस नहीं होती। कभी-कभी वो होती है—एक और मौका। बस इतना काफी है।

pm    
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